मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के अनुसार संवैधानिक लोकतंत्र के लिए न्यायालिका की निष्पक्ष, जानकारी से भरी और सकारात्मक आलोचना जरूरी है।
सोमवार को 6ठे राम जेठमलानी स्मृति व्याख्यान कार्यक्रम में पहुँचे सीजेआई ने यह राय तब व्यक्त की जब जस्टिस यशवंत वर्मा विवाद में देश के दो मशहूर वकीलों हरीश साल्वे और महेश जेठमलानी ने न्यायपालिका में पारदर्शिता को लेकर उनसे सीधे सवाल पूछ लिए।
वर्मा मामले, जिसमें जज के घर पर नकदी के जलते ढेर मिले थे, का ज़िक्र करते हुए जेठमलानी ने पूछा कि संबंधित जज तो जांच रुकवाने के लिए बार-बार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए, लेकिन इस मामले में एक एफआईआर तक दर्ज क्यों नहीं की गई? साल्वे ने जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े उस मामले को संभालने के तरीके पर सवाल उठाए।
जेठमलानी ने कहा कि न्यायपालिका के कामकाज में पारदर्शिता की बहुत ही ज्यादा जरूरत है। जबकि साल्वे ने सवाल दाग दिया कि अगर किसी मंत्री के घर ऐसी घटना हुई होती, तो क्या वह एफआईआर से बच सकता था? उन्होंने पूछा कि कानून को अपना काम क्यों नहीं करने दिया गया और इस मामले में कोई आपराधिक केस क्यों दर्ज नहीं किया गया।
उन्होंने यह भी पूछा कि अगर किसी ऐसे व्यक्ति के घर पर इसी तरह की घटना घटती, जो जुडिशरी से नहीं जुड़ा होता और जनहित याचिका डाली गई होती तो न्यायपालिका क्या करती?
इन सवालों के जवाब में सीजेआई सूर्यकांत ने कहा, ‘इसमें कोई संदेह नहीं है कि हर सिस्टम और मैकेनिज्म को बेहतर किया जा सकता है। लेकिन, मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि जजों के खिलाफ शिकायतों से निपटने के लिए इंटर्नल मैकेनिज्म पर्याप्त रहा है।’
सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि जजों के खिलाफ ज्यादातर शिकायतें उनकी होती हैं, जो कोर्ट में मुकदमा हारने से नाराज रहते हैं।उन्होंने सवाल किया कि क्या इन शिकायतों पर सार्वजनिक रूप से विचार करना उचित होगा? अगर ऐसा होता है तो जजों और जुडिशरी का क्या होगा?
इसपर हरीश साल्वे ने कहा कि अदालतों को कानून पर डटे रहना होगा। उन्होंने कहा, ‘जब वे इससे हटते हैं, तो परिणाम बहुत ही विनाशकारी होते हैं। उन्होंने कहा कि कोर्ट-मॉनिटर्ड जांच एक मिथक है। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला, कोल ब्लॉक आवंटन घोटाला और हवाला घोटाला मामलों का क्या हुआ, जिनकी जांच कोर्ट के निगरानी में हुई? जब अदालतें किसी जांच की निगरानी करती हैं तो जांच एजेंसी की स्वतंत्रता चली जाती है और वह जल्दी नतीजे पर पहुंचने में जुट जाती है और वहीं से चीजें गड़बड़ाने लगती हैं।’
हरीश साल्वे ने कहा कि ‘जब सरकार कमजोर होती है और न्यायपालिका मजबूत होती है, तब उठाए जाने वाले सवालों की सब सराहना करते हैं। लेकिन, जब सरकार मजबूत होती है, तब लोग यह मूल्यांकन करते हैं कि न्यायपालिका सरकार के सामने कितनी बार सवाल उठाती है। इसी वक्त तीनों अंगों के बीच का संतुलन बिगड़ जाता है।’
साल्वे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी रामास्वामी मामले में दिए गए फैसले में जो सुरक्षा उपाय बताए गए थे, उनका मकसद जजों को मुक़दमेबाज़ों की बेबुनियाद शिकायतों से बचाना था, न कि भारत के मुख्य न्यायाधीश के ध्यान में लाए गए मामले में कार्रवाई को रोकना।
साल्वे ने कहा, “जब भारत के मुख्य न्यायाधीश को बताया गया कि ऐसी घटना हुई है और संस्थान के पास इसका वीडियो ट्रांसक्रिप्ट भी है, तो उस समय किसी जज को डराने-धमकाने के लिए कार्रवाई करने का सवाल ही नहीं उठता था। यह कोई मुक़दमेबाज़ नहीं था। उन्हें कहना चाहिए था कि कानून को अपना काम करने दिया जाए।”
साल्वे ने कहा कि न्यायिक स्वतंत्रता का मतलब जजों को जवाबदेही या जांच से बचाना नहीं है। उन्होंने कहा, “न्यायपालिका को स्वतंत्रता संवैधानिक प्रावधानों से नहीं मिलती जो आपको पहुंच से बाहर कर देते हैं। यह संवैधानिक प्रावधानों से नहीं होता कि आप किसी ऐसे साथी को बचा सकें जो जलते हुए कैश के साथ पकड़ा गया हो। स्वतंत्रता आपके अपने चरित्र से बनती है और पैदा होती है।”
साल्वे ने कहा कि इस घटना ने जवाबदेही लागू करने के लिए एक प्रभावी तंत्र बनाने में न्यायपालिका की विफलता को उजागर किया है। उन्होंने कहा कि कुछ गलत मामलों से भी संस्थान में जनता का भरोसा कम हो सकता है।
उन्होंने कहा, “और अगर हम ऐसी स्थिति में हैं जहां कोई पूछता है कि उस घटना का क्या हुआ और हमें शर्मिंदा होना पड़ता है, तो ऐसा इसलिए है क्योंकि हमने ऐसे संस्थान को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है जो न्यायिक जवाबदेही लागू कर सके।”
सीजेआई ने कहा कि संवैधानिक लोकतंत्र के लिए न्यायालिका की निष्पक्ष, जानकारी से भरी और सकारात्मक आलोचना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि एक संस्था के तौर पर न्यायपालिका मूल्यांकन से ऊपर नहीं है और न ही हो सकती है। न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष, जानकारी से भरपूर और सकारात्मक आलोचना एक जीवित संवैधानिक लोकतंत्र की उचित और आवश्यक विशेषता है, जो संस्थागत उत्तरदायित्व और आत्म सुधार का अवसर देती है।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)